Grade -6 Hindi (रोली) श्रीलंका की यात्रा- पाठ

 

 

मेरे घर की स्त्रियों की इच्छा हुई कि मद्रास (चेन्नई) कांग्रेस अधिवेशन के समय उधर से ही वे तीर्थाटन भी करती आएँ, क्योंकि रामेश्वरम वहाँ से करीब है। मेरे साथ भाई साहब की पत्नी, मेरी पत्नी और कई मित्रों के घर की महिलाएँ मद्रास गईं। जाते समय लोग गोदावरी-स्नान के लिए राजमहेंद्री में ठहर गए थे।

 

कांग्रेस के अधिवेशन के बाद मदुरै, रामेश्वरम आदि तीर्थों पर गए। रामेश्वरम के दर्शन के बाद हम लोग श्रीलंका गए। घर के लोगों को वहीं छोड़ दिया। श्रीलंका जाने की सुविधा यह भी थी कि उन दिनों श्री रामोदारदास जी वहाँ लानिया के एक महाविद्यालय में बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने कई बरसों तक छपरा में कांग्रेस का काम करके और कई बार जेल - यात्रा करने के बाद, बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन के लिए वहाँ जाने का निश्चय किया था। उनको वहाँ संस्कृत पढ़ाने तथा पाली त्रिपिटक आदि ग्रंथों के अध्ययन का अवसर मिला। कुछ दिनों बाद बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर वे श्री राहुल सांकृत्यायन के नाम से मशहूर हुए और भिक्षु हो गए। उस समय वे केवल अध्ययन कर रहे थे, भिक्षु नहीं बने थे।

 

जब हम लोग वहाँ गए, उन्होंने श्रीलंका के मुख्य-मुख्य स्थानों पर हमारे भ्रमण का प्रबंध किया। हमने भाड़े पर एक लॉरी ली और कई दिनों तक वहाँ घूमते-फिरते रहे। यह हम लोगों के लिए पहला ही अवसर था कि उस सुंदर टापू में हम भ्रमण कर रहे थे। टापू की खूबसूरती और हरियाली ने हम लोगों को मुग्ध कर दिया। कंडी के सुंदर मंदिर वहा से नूरएलिया के पहाड़ पर जाकर रात बिताई। वहाँ से सीताएलिया गए। कहा जाता है कि यहाँ पर रावण ने श्री जानकी जी को कैद करके अशोक वाटिका में रखा था। वहाँ जाते समय एक विचित्र चीज़ हम लोगों ने देखी सीताएलिया नूरएलिया से कुछ दूर है। नूरएलिया पहाड़ की चोटी पर है और सीताएलिया पहाड़ के नीचे है। इसके चारों और पहाड़ हैं। ऐसा मालूम होता है कि प्रकृति ने मानो एक कटोरा बना दिया है, जिसकी दीवारें पहाड़ की हैं और जिसके पेंदे में एक छोटा-सा झरना है। वहीं एक छोटा मंदिर-सा है जहाँ जानकी जी कैद की गई थीं। पहाड़ से उतरने में मोटर को कई बार चक्कर लगाना पड़ता इसका नाम श्रीलंका कर दिया. गया। है। उतरते समय हमने देखा कि कुछ दूर तक चारों तरफ़ फैला हुआ रक्तापोश का जंगल है। पहाड़ काटकर जो सड़क बनी थी, उसकी बगल में दीवार की तरह पहाड़ खड़ा था। उस दीवार में कई तरह की मिट्टी या पत्थर देखने में आते थे। उसमें एक तह, जो प्रायः दो-तीन फुट चौड़ी थी, ऐसी मिट्टी की थी जो बिलकुल राख जैसी थी। हमने इस मिट्टी को खोदकर देखा। ऐसा मालूम होता है कि जैसे ऊपर-नीचे पथरीली मिट्टी की तह है और बीच में एक तह राख की है। अशोक के पत्ते और राख हम अपने साथ भी लाए थे। इनको देखकर रामायण में वर्णित अशोक वाटिका और हनुमान जी द्वारा श्रीलंका के जलाए जाने की बात याद आ गई। अनेक स्थानों को- जिनमें एक सुंदर गुफा थी जिसमें बहुत प्राचीन, सुंदर चित्र बने थे- देखते हुए हम लोग अनुराधपुर पहुँचे। यहाँ एक बहुत बड़ा स्तूप है। कहा जाता है कि अशोक के पुत्र महेंद्र ने, यहीं 'गया' से लाई हुई महाबोधि वृक्ष की एक शाखा लगाई थी। हम लोग वहाँ रात में नौ बजे के लगभग पहुँचे थे। पीपल के एक वृक्ष के पास बौद्धों की धार्मिक सभा हो रही थी। उसमें एक भिक्षु कुछ उपदेश दे रहे थे। दृश्य बहुत ही सुंदर था। हृदय पर उसका बहुत असर पड़ा। हम उपदेश को समझ तो न सके, पर वहाँ बैठी हुई श्रोतामंडली बीच बीच में जो 'साधु! साधु !' कह उठती थी उसे हम समझ सके। लोगों ने बताया कि पीपल का यह वृक्ष वही है, जिसे महेंद्र ने लाकर लगाया था। यों तो बोधगया में भी जो महाबोधि वृक्ष है वह भी उस समय का नहीं है, पर उसी स्थान पर उसी वृक्ष का वंशज है। उसी तरह अनुराधपुर का महाबोधि वृक्ष भी महेंद्र का लगाया हुआ नहीं है, उसका वंशज है जो उस स्थान पर आज तक किसी-न-किसी तरह से कायम है। इससे भी अधिक चमत्कार और आश्चर्य की बात हमको यह सुनाई गई कि वहाँ जो दीप जल रहा था, वह भी महेंद्र का जलाया हुआ है। उस समय से आज तक वह दीप कभी बुझा नहीं है। बौद्धों ने उसे बाईस-तेईस सौ बरसों से बराबर जलाए रखा है। यदि यह सच है तो शायद दुनिया में ऐसी कोई दूसरी अग्निशिखा न मिलेगी जो दो हज़ार बरसों से भी ज़्यादा समय से बराबर जलती आ रही हो।

 

श्रीलंका की यात्रा समाप्त करके हम लोग रामेश्वरम लौटे। वहाँ से परिवार के लोगों को लेकर, जिन तीर्थस्थलों पर पहली बार न जा सके थे, उनमें जाते हुए छपरा वापस आए।

 

-           -   डॉ० राजेंद्र प्रसाद


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